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एक दिन, एक व्यक्ति उस उद्यान में आया, जहाँ बुद्ध उपदेश दे रहे थे। उसका चेहरा क्रोध से लाल हो रहा था। वह एक दूसरे समूह से संबंधित था और बुद्ध के बढ़ते प्रभाव से स्वयं को असुरक्षित महसूस करता था। वहाँ एकत्रित लोगों के सामने वह बुद्ध को अपशब्द कहने लगा। उसने बुद्ध को ढोंगी, पाखंडी और मूर्ख तक कह डाला।
बुद्ध ने उसे बीच में नहीं रोका। वे शांत भाव से बैठे रहे और अत्यंत धैर्य तथा पूर्ण शांति के साथ उसकी बातें सुनते रहे। जब अंततः वह व्यक्ति बोलते-बोलते थक गया और उसकी गालियाँ समाप्त हो गईं, तब बुद्ध ने मंद मुस्कान के साथ उससे एक प्रश्न पूछा।
“मित्र, यदि तुम किसी व्यक्ति के लिए कोई उपहार खरीदो और वह व्यक्ति उसे स्वीकार करने से इनकार कर दे, तो वह उपहार किसका रहेगा?”
बुद्ध की शांत प्रतिक्रिया से आश्चर्यचकित होकर उस व्यक्ति ने उत्तर दिया, “भला, वह उपहार मेरा ही रहेगा। आखिर उसे मैंने खरीदा है।”
बुद्ध ने सिर हिलाते हुए कहा, “बिल्कुल सही। इसी प्रकार, मैं तुम्हारे क्रोध, तुम्हारे अपशब्दों और तुम्हारे दुर्व्यवहार को स्वीकार नहीं करता। वे सब तुम्हारे ही पास रहेंगे। तुम उन्हें अपने साथ घर ले जा सकते हो।”
इसके बाद बुद्ध ने आगे समझाया, “यदि कोई व्यक्ति तुम पर क्रोधित हो और तुम भी उसे अपशब्द कहकर उत्तर दो, तो इसका अर्थ है कि तुमने उसके उपहार को स्वीकार कर लिया। लेकिन यदि तुम शांत बने रहते हो, तो उसका क्रोध उसी व्यक्ति के पास लौट जाता है, जो उसे लेकर आया था। क्रोध केवल उसी व्यक्ति को हानि पहुँचाता है, जो उसे अपने भीतर सँजोकर रखता है। यह ऐसा ही है, जैसे किसी दूसरे पर फेंकने के इरादे से जलता हुआ कोयला हाथ में पकड़ना। दूसरे को जलाने से पहले तुम्हारा अपना हाथ जलता है।”
वह व्यक्ति स्तब्ध होकर मौन खड़ा रहा। बुद्ध की शांत और स्पष्ट वाणी के सामने उसकी अपनी शत्रुता का सारा भार ढह गया। जब उसे बुद्ध के शब्दों की सच्चाई का बोध हुआ, तो उसका क्रोध लज्जा और श्रद्धा में बदल गया। उसने बुद्ध के सामने गहराई से सिर झुकाया, क्षमा माँगी और उनका अनुयायी बनने की इच्छा व्यक्त की।
शिक्षा: यह प्रसंग क्षान्ति (धैर्य, सहनशीलता और क्षमाशीलता) के सिद्धांत को दर्शाता है। यह हमें याद दिलाता है कि हम दूसरों के व्यवहार को नियंत्रित नहीं कर सकते, लेकिन उनकी नकारात्मकता को स्वीकार करना है या उसे जाने देना है, इस पर हमारा पूरा नियंत्रण होता है।
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