खुद को खुश रखना सीखें: दूसरों को खुश करने का भ्रम और आत्म-संतोष का मार्ग
दुनिया में हर कोई किसी न किसी को खुश करने में लगा है। माता-पिता बच्चों को खुश देखना चाहते हैं, बच्चे माता-पिता को, पति पत्नी को, व्यापारी ग्राहक को, रिश्तेदार एक-दूसरे को। लेकिन इस चक्कर में इंसान खुद को खो देता है। नीति का पहला सूत्र यही है कि अगर आप दुनिया को खुश रखते हुए खुद दुखी हो, तो आप ज्ञानी नहीं, अज्ञानी हैं। खुद को खुश रखना कोई स्वार्थ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है।
एक आम भारतीय गृहिणी को ही लें। सुबह जल्दी उठकर बच्चों का टिफिन तैयार करना, पति के लिए नाश्ता बनाना, घर में मेहमान आएं तो सबको खिलाना और आखिर में खुद चुपचाप दो रोटी खा लेना या कई बार भूखी रह जाना। यह त्याग जैसा दिखता है, पर नीति कहती है कि यह गलत है। अगर आप सबको खिलाकर खुद भूखे रह जाते हैं तो आपने अपने अतिथि का सम्मान नहीं, अपने शरीर का अपमान किया है। खुद को खिलाना भी उतना ही जरूरी है जितना दूसरों को खिलाना।
उम्मीदों का बोझ कैसे तोड़ें
दुख की सबसे बड़ी जड़ है: अपेक्षा। नीति कहती है कि परिश्रम, प्रार्थना और प्रतीक्षा, ये तीन चीजें जीवन में साथ रखें। अपना शत-प्रतिशत दें, बाकी परिणाम की चिंता छोड़ दें। लेकिन हम उल्टा करते हैं। मेहनत कम करते हैं और अपेक्षाएं आसमान छूती रहती हैं।
एक व्यापारी का किस्सा है। उसने शहर से बाहर एक प्लॉट खरीदा। उस समय वह प्लॉट नगर निगम की सीमा में नहीं आता था, इसलिए दाम कम थे। किसी ने कहा कि एक साल बाद यह इलाका शहर में शामिल हो जाएगा, दाम कई गुना बढ़ जाएंगे। व्यापारी ने सोचा ठीक है। लेकिन सरकार बदल गई, योजनाएं बदल गईं, पांच साल बीत गए और प्लॉट उस श्रेणी में नहीं आया जिससे दाम बहुत ज्यादा बढ़ते। दाम बढ़े जरूर, लेकिन उतने नहीं जितनी उम्मीद थी। नतीजा यह हुआ कि वह व्यापारी लाभ कमाने के बाद भी दुखी रहा। उसे इस बात की खुशी नहीं थी कि उसका पैसा बढ़ गया, बल्कि दुख इस बात का था कि और ज्यादा क्यों नहीं बढ़ा।
एक और कहानी है। एक आदमी ने दस लाख रुपये में बड़ी जमीन खरीदी। 26 साल पहले उसने वह जमीन 22 लाख रुपये में बेची और बहुत खुश हुआ कि पैसा दोगुना हो गया। लेकिन तीन दिन बाद उसी जमीन की अगली रजिस्ट्री 44 लाख में हुई। एक हफ्ते बाद 66 लाख में। एक महीने के भीतर वह जमीन 10 लाख से 66 लाख तक पहुंच गई। क्यों? क्योंकि खरीदने वाले को वहां पेट्रोल पंप खोलना था और उसे उसी जमीन की जरूरत थी। अब पहले बेचने वाले को सबसे ज्यादा तनाव था। उसने 12 लाख का मुनाफा कमाया था, लेकिन वह उस 56 लाख के काल्पनिक नुकसान पर रो रहा था जो उसे मिला ही नहीं। यही अपेक्षा का खेल है।
| अपेक्षा वाला व्यक्ति | स्वीकार करने वाला व्यक्ति |
|---|---|
| जो नहीं मिला उस पर रोता है | जो मिला उसका आनंद लेता है |
| हमेशा दूसरों से तुलना करता है | अपनी मेहनत पर भरोसा रखता है |
| छोटी हार में टूट जाता है | अगला मैच देखता है |
| धैर्य खो देता है | प्रार्थना और प्रतीक्षा में विश्वास रखता है |
किस्मत और समय का नियम
नीतिकार का सूत्र है: "वक्त से पहले और किस्मत से ज्यादा किसी को मिलता नहीं है।" इसलिए मेहनत करो, परिणाम स्वीकार करो और आगे बढ़ो। यह बात छात्रों के तनाव पर भी लागू होती है। आज बच्चों का तनाव स्तर इतना बढ़ गया है कि अगर परीक्षा में मन मुताबिक परिणाम नहीं आया, अखिल भारतीय रैंक नहीं मिली, तो वे हार मान लेते हैं। कुछ तो जान देने की बात तक करते हैं। लेकिन सोचिए, अगर आप जिंदा रहेंगे तभी कुछ हासिल कर पाएंगे। बड़ी-बड़ी कंपनियों के मालिक पहली बार नौकरी के लिए अस्वीकार किए गए थे। बाद में उन्होंने अपनी कंपनियां खोलीं और सबको पीछे छोड़ दिया। इसलिए जल्दबाजी न करें, चिंता न करें।
गुरु और भगवान से अपेक्षा क्यों नहीं रखें
सबसे बुरी स्थिति तब आती है जब हम गुरु और भगवान से भी अपेक्षा करने लगते हैं। हम चाहते हैं कि हमारी मनचाही बात पूरी हो। जब ऐसा नहीं होता तो श्रद्धा टूट जाती है और श्रद्धा टूटते ही सब कुछ बिखर जाता है। इसलिए नीति कहती है: मेहनत करने के बाद जो प्रतिफल मिला है, उसमें खुश रहो। सोचो कि मेरे भाग्य में यही था। भगवानों में भी तो भेद है। कोई शांतिनाथ की पूजा करता है, कोई आदिनाथ की, कोई कुंथुनाथ की। जब भगवानों में अलग-अलग विशेषताएं हैं तो इंसानों में अंतर क्यों नहीं होगा? मेहनत करो, जो परिणाम मिल रहा है उसे स्वीकार करो और आगे बढ़ो।
सद्भाव और अभाव का फर्क
खुश रहने का सबसे सरल सूत्र है: सद्भाव में अभाव देखने की बजाय अभाव में सद्भाव देखना। सद्भाव यानी जो चीजें आपके पास हैं, अभाव यानी जो नहीं हैं। किसी अपने का वियोग हो गया तो हम सोचते हैं कि वह अब नहीं है। लेकिन हमें यह सोचना चाहिए कि वह कभी हमारे साथ था, यही सद्भाव है। इसी तरह जो लोग आज पास हैं, एक दिन उनका भी अभाव होगा। इसलिए आज उनके साथ खुश रहना सीखें।
याद रखें: "जो प्राप्त है वह पर्याप्त है।" यह छोटा सा वाक्य पूरे जीवन का गणित है। जो इसे समझ गया, वह कभी दुखी नहीं रह सकता।
खुद से वादा करें
आज ही खुद से एक वादा करें: "मैं दुखी नहीं रहूंगा। मैं खुश हूं और पुरुषार्थ करता रहूंगा।" अगर कोई गलती हो जाए, कोई बात बिगड़ जाए, तो खुद से कहें: "ये मैच जाने दो, अगला देखेंगे।" छोटी-छोटी नाराजगियां ही जीवन को भारी बना देती हैं।
दुनिया का सबसे बड़ा कैसिनो चलाने वाला मैनेजर भी दुखी हो सकता है और प्रधानमंत्री भी तनाव में रहता है। जितनी बड़ी ढोल होती है, उतनी बड़ी पोल भी होती है। बाहरी सफलता भीतर की खुशी की गारंटी नहीं है। जो खुद में खुश नहीं है, वह चाहे कितना भी बड़ा हो, सबसे छोटा और असफल है।
निष्कर्ष
दूसरों को खुशी देने से पहले खुद को खुश रखना सीखें। "ददाति यत्तु यस्यास्ति" अर्थात जिसके पास जो है, वह वही आगे बांटता है। अगर आपके भीतर खुशी है तो आप दुनिया को खुशी दे सकते हैं, और अगर भीतर उदासी है तो वही उदासी बाहर फैलेगी। इसलिए आज से अभाव नहीं, सद्भाव देखें। मेहनत करें, नतीजा स्वीकार करें और खुद को खुश रखें। यही सबसे बड़ी सफलता है।

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