Saturday, September 26, 2026

शिक्षा का सिकुड़ता रास्ता: प्राथमिक से उच्चतर माध्यमिक तक क्यों गायब हो जाते हैं 73% बच्चे?

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शिक्षा का सिकुड़ता रास्ता: प्राथमिक से उच्चतर माध्यमिक तक क्यों गायब हो जाते हैं 73% बच्चे?

भारत में हर 100 बच्चे जो प्राथमिक स्कूल में दाखिला लेते हैं, उनमें से केवल 27 ही उच्चतर माध्यमिक तक पहुंच पाते हैं। यानी करीब 73 फीसदी छात्र बीच में ही शिक्षा व्यवस्था से बाहर हो जाते हैं। यह कोई अनुमान या प्रोजेक्शन नहीं है, बल्कि संसदीय समिति की रिपोर्ट में सामने आया एक कड़ा तथ्य है। समिति ने उच्च शिक्षा स्तर पर स्कूलों और छात्रों की संख्या में गिरावट को गंभीर बताया है।

नामांकन का गिरता ग्राफ

यह आंकड़ा अनुमान समिति की 10वीं रिपोर्ट (18वीं लोकसभा) से आया है, जो यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस यानी UDISE+ 2024-2025 के आंकड़ों पर आधारित है। प्राथमिक स्तर पर भारत में 6.18 करोड़ छात्र हैं। अपर प्राइमरी तक आते-आते यह संख्या घटकर 4 करोड़ से कुछ अधिक रह जाती है। सेकेंडरी स्तर पर यह और गिरकर 2.36 करोड़ हो जाती है। उच्चतर माध्यमिक तक पहुंचते ही केवल 1.64 करोड़ छात्र बचते हैं। यानी शिक्षा की सीढ़ी चढ़ने के साथ हर पायदान पर बड़ी संख्या में बच्चे छूटते जा रहे हैं।

स्कूलों का घटता जाल

सिर्फ नामांकन ही नहीं, स्कूलों की संख्या भी सिकुड़ रही है। देश में कुल 10.93 लाख स्कूल हैं, जिनमें सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल शामिल हैं। इनमें करीब 9.11 लाख प्राथमिक स्कूल हैं। अपर प्राइमरी स्तर पर यह संख्या घटकर 4.13 लाख रह जाती है। सेकेंडरी स्तर पर 1.62 लाख स्कूल हैं, लेकिन उच्चतर माध्यमिक स्तर पर तो केवल 90,866 स्कूल बचते हैं। यह गिरावट बताती है कि जैसे-जैसे बच्चे ऊंची कक्षाओं में पहुंचते हैं, उनके लिए उपलब्ध स्कूलों की उपलब्धता भी तेजी से घटती जाती है।

पैनल की साफ सिफारिश

संसदीय पैनल का कहना है कि इस समस्या को केवल छात्रों के ड्रॉपआउट के तौर पर नहीं देखा जा सकता। यह उच्च कक्षाओं, खासकर उच्चतर माध्यमिक स्कूलों की घटती उपलब्धता को भी दिखाता है। पैनल ने सिफारिश की है कि मौजूदा प्राथमिक और सेकेंडरी स्कूलों को अपग्रेड करके पूर्ण उच्चतर माध्यमिक स्कूलों में बदला जाए। साथ ही राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सेकेंडरी और उच्चतर माध्यमिक क्षमता का विस्तार करना चाहिए। उद्देश्य यह है कि कोई भी छात्र सिर्फ इसलिए शिक्षा व्यवस्था से बाहर न हो जाए क्योंकि अगली कक्षा का स्कूल बहुत दूर है या उसके गांव-कस्बे में उपलब्ध ही नहीं है।

दिव्यांग बच्चों की अनदेखी

दिव्यांग बच्चों के लिए चुनौती और भी बुनियादी है। देश में 14 लाख से अधिक स्कूलों में से केवल 5.2 लाख स्कूलों में दिव्यांग बच्चों के लिए शौचालय हैं। करीब 8 लाख स्कूलों में हैंड्रेल वाले रैंप हैं। इसका मतलब है कि बड़ी संख्या में स्कूलों में बुनियादी सुगम्यता ढांचा ही मौजूद नहीं है। ऐसे में दिव्यांग बच्चों के लिए स्कूल पहुंचना और वहां टिके रहना बेहद मुश्किल हो जाता है।

फंड का अधूरा उपयोग

एक और बड़ी समस्या है धन के उपयोग में भारी कमी। वित्त वर्ष 2024-25 में दिव्यांग बच्चों के लिए 186 शौचालयों के निर्माण हेतु 4.82 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, लेकिन केवल 2.6 लाख रुपये ही खर्च हो पाए। यह आवंटन का 1 फीसदी भी नहीं है। इसी तरह प्रारंभिक स्तर पर विशेष शिक्षकों के लिए 9.62 करोड़ रुपये का अनुदान रखा गया था, जिसमें से मात्र 80.5 लाख रुपये का उपयोग हुआ। यह आंकड़े बताते हैं कि बजट में पैसा रखने और जमीन पर काम कराने के बीच बहुत बड़ा फासला है।

निष्कर्ष

भारत ने स्कूलों का विशाल नेटवर्क तो खड़ा किया है, लेकिन आंकड़े दिखाते हैं कि यह नेटवर्क ठीक उसी जगह पतला होता जाता है, जहां छात्र उच्च शिक्षा की ओर बढ़ते हैं। दिव्यांग बच्चों के लिए तो कई स्कूलों में बुनियादी पहुंच भी दूर की बात बनी हुई है। संसदीय पैनल ने कमियों को चिह्नित कर दिया है। अब असली चुनौती इन अंतरालों को पाटने की है।

facts

- संसदीय अनुमान समिति की 10वीं रिपोर्ट (18वीं लोकसभा) के अनुसार प्राथमिक स्कूल में दाखिला लेने वाले हर 100 बच्चों में से केवल 27 उच्चतर माध्यमिक तक पहुंचते हैं।

- UDISE+ 2024-2025 के आंकड़ों के अनुसार प्राथमिक स्तर पर 6.18 करोड़, अपर प्राइमरी पर 4 करोड़ से अधिक, सेकेंडरी पर 2.36 करोड़ और उच्चतर माध्यमिक पर 1.64 करोड़ छात्र हैं।

- देश में कुल 10.93 लाख स्कूल हैं, जिनमें उच्चतर माध्यमिक स्तर पर केवल 90,866 स्कूल बचते हैं।

- 14 लाख से अधिक स्कूलों में से केवल 5.2 लाख में दिव्यांग बच्चों के लिए शौचालय और करीब 8 लाख में हैंड्रेल वाले रैंप हैं।

- 2024-25 में दिव्यांग बच्चों के 186 शौचालयों के लिए 4.82 करोड़ रुपये आवंटित हुए, लेकिन केवल 2.6 लाख रुपये खर्च हुए।

- प्रारंभिक स्तर पर विशेष शिक्षकों के लिए 9.62 करोड़ रुपये के अनुदान में से केवल 80.5 लाख रुपये का उपयोग हुआ।

criticisms

- केंद्र और राज्य सरकारों ने उच्चतर माध्यमिक स्कूलों का विस्तार करने में वर्षों से लापरवाही बरती है, जिससे करोड़ों बच्चों की शिक्षा बीच में ही रुक जाती है।

- शिक्षा बजट का बड़ा हिस्सा प्राथमिक स्कूलों पर केंद्रित रखा गया, जबकि माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक स्तर पर बुनियादी ढांचे की घोर उपेक्षा की गई।

- दिव्यांग बच्चों के लिए आवंटित धन का 99 फीसदी से अधिक हिस्सा खर्च न होने देना प्रशासनिक विफलता और जवाबदेही की गंभीर कमी को उजागर करता है।

- राज्य सरकारों ने स्कूलों के युक्तिकरण के नाम पर ग्रामीण इलाकों में उच्च कक्षाओं के स्कूल बंद किए, जिससे छात्रों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है या पढ़ाई छोड़नी पड़ती है।

- संसदीय पैनल की रिपोर्टों को सरकारें अक्सर सिफारिशों तक सीमित रखती हैं, ठोस कार्ययोजना, समयबद्ध क्रियान्वयन और सार्वजनिक निगरानी का लगातार अभाव रहता है।

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