बैंक ऐसा दोस्त जैसा? IDBI की बिक्री और जनता का मुनाफ़ा?
एक बैंक है IDBI। उसका नारा है— "बैंक ऐसा दोस्त जैसा।" आपका दोस्त जैसा बैंक बिक गया है। गनीमत है कि उसके हाथों नहीं बिका जिसका फोटो दिखाकर राहुल गांधी प्रधानमंत्री का दोस्त बताते हैं। बात यह है कि खुद को दोस्त जैसा बैंक कहने वाले IDBI के कर्मचारियों को इस समय बहुत से दोस्तों की ज़रूरत है, जो उनकी व्यथा को सुन सकें, समझ सकें, और बैंक को बिकने से बचा सकें।
IDBI के हज़ारों कर्मचारी 2 और 3 नवंबर को हड़ताल करने जा रहे हैं। सवाल सीधा है — 30,000 करोड़ से अधिक का मुनाफ़ा पिछले छह साल में कमाने वाले बैंक को क्यों निजी हाथों में बेचा गया? वह भी विदेशी हाथों में? सरकार की समाचार एजेंसी PIB ने अपनी प्रेस रिलीज़ में क्यों कहा कि बैंक घाटे में चल रहा था और सरकार की मदद की ज़रूरत पड़ रही थी? सरकार ने 2010 से 2020 के बीच 25,000 करोड़ रुपए इसमें डाले हैं। किस लिए डाले? इसलिए कि एक दिन बैंक मुनाफ़े में आएगा। 2020 से पहले के घाटे बताए जा रहे हैं, लेकिन 2020 के बाद के मुनाफ़े पर ज़ोर क्यों नहीं दिया जा रहा?
एक सफल बैंक की बिक्री का सवाल
जिस बैंक ने वित्त वर्ष 2026 में 9,513 करोड़ का मुनाफ़ा कमाया और 2025 की तुलना में 27 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की, उसे कनाडा के Fairfax Financial Holdings Limited के हाथों क्यों बेचा गया? बैंकों के खरीदने और बेचने के खेल बहुत बड़े होते हैं। पर्दे के पीछे तक पहुँचना आसान नहीं। लेकिन यह घटना इतनी भी मामूली नहीं कि चुप्पी पसर जाए।
हमेशा की तरह बिज़नेस अख़बारों में ढोल नगाड़े बजने लगे हैं कि IDBI को बेचने का फ़ैसला बहुत सही है। इससे ये फ़ायदा होगा, वो फ़ायदा होगा, और डील फेयर है। सरकार की संपत्ति जब भी बेची जाती है, बिज़नेस अख़बारों की खुशी का ठिकाना नहीं रहता। खबरें चलने लगी हैं कि इससे बात नहीं बनेगी, और भी बैंक बेचे जाएँगे। मोदी सरकार सरकारी बैंकों में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी 20% से बढ़ाकर 49% करने पर विचार कर रही है।
बिक्री का गणित और टूटा वादा
सरकार ने कहा कि भारत के वित्तीय सेवा सेक्टर में इससे बड़ा विदेशी निवेश, यानी डिस-इन्वेस्टमेंट, पहले कभी नहीं हुआ। सरकार ने 52,878 करोड़ रुपए में IDBI बैंक बेच दिया। रिज़र्व बैंक की मंज़ूरी बाकी है — मिल ही जाएगी। जो 60 प्रतिशत हिस्सा बेचा गया है, उससे 52,878 करोड़ रुपए आएँगे, और वह सरकार और LIC के बीच बंट जाएँगे। करीब 61 प्रतिशत हिस्सा बेचने के बाद सरकार की हिस्सेदारी 15 प्रतिशत रह जाती है। वह भी उसे ओपन मार्केट में बेच सकती है और माइनॉरिटी शेयरहोल्डर बन जाएगी।
याद कीजिए साल 2004। जब इस बैंक का स्टेटस बदला गया, तब के वित्त मंत्री जसवंत सिंह, जो BJP के नेता रहे, ने संसद के दोनों सदनों को आश्वासन दिया था कि किसी भी परिस्थिति में सरकार की IDBI में हिस्सेदारी 51 प्रतिशत बनी रहेगी। आज वही पार्टी सत्ता में है, और वही हिस्सेदारी 15 प्रतिशत पर ला दी गई है। वादे की यह गिरावट देखिए — 51 से 15 प्रतिशत तक।
घाटा जनता का, मुनाफ़ा निजी का — एक पुराना पैटर्न
द वायर में देविदास तुलजापुरकर ने लिखा है कि IDBI को बेचकर प्राइवेट सेक्टर को तोहफ़ा दिया जा रहा है। जब बैंक संकट में था तो जनता ने रिस्क लिया, अपने पैसे लगाए, और जब मुनाफ़े में आया तो प्राइवेट सेक्टर को घुसा दिया गया ताकि मुनाफ़े पर प्राइवेट सेक्टर का कंट्रोल हो जाए।
इस बैंक ने जनधन खाते खोले, जीवन ज्योति बीमा, सुरक्षा बीमा, अटल पेंशन योजना, मुद्रा लोन, स्ट्रीट वेंडर के लिए स्वा निधि, किसान सम्मान निधि के खाते खोले। लोगों के खातों में सीधे पैसे भेजे गए। यह सब IDBI बैंक कर रहा था — सरकार की योजनाओं को जनता के बीच ले जा रहा था। अब यह प्राइवेट हो जाएगा तो सरकार की योजनाओं का क्या होगा? गाँव-देहात के लोगों की मदद कौन करेगा?
यह कोई नई कहानी नहीं है। इस देश में जनता के पैसे से उन जगहों पर भी एयरपोर्ट बनाए गए जहाँ ट्रैफ़िक नहीं था। कुछ समय बाद उड़ानें बंद हो गईं, कम हो गईं। अब उन्हीं जगहों को प्राइवेट हाथों में दिया जा रहा है। एयरपोर्ट चलाने के लिए प्राइवेट कंपनी दौड़कर आ जाती है। उनसे यह क्यों नहीं कहा जाता कि जब आपको चलाना आता है तो बनाना भी आता होगा, तो आप ही अपने पैसे से एयरपोर्ट बना लीजिए? ऐसा क्यों नहीं किया जाता?
मुनाफ़े और घाटे का आँकड़ा — एक नज़र में
बैंक की स्थिति को समझने के लिए कुछ आँकड़ों पर नज़र डालिए। ये आँकड़े बताते हैं कि बैंक अब मुनाफ़े की राह पर है और बिक्री का फ़ैसला कितना विरोधाभासी है।
| मापदंड | विवरण |
|---|---|
| वित्त वर्ष 2025 का मुनाफ़ा | 7,515 करोड़ रुपए |
| वित्त वर्ष 2026 का मुनाफ़ा | 9,513 करोड़ रुपए |
| वार्षिक वृद्धि दर | 27 प्रतिशत |
| पिछले 6 वर्षों का कुल मुनाफ़ा | 30,000 करोड़ रुपए से अधिक |
| कुल डिपॉज़िट | 3.46 ट्रिलियन रुपए (12% वार्षिक वृद्धि) |
| कुल बिज़नेस (30 सितंबर तक) | 6.26 ट्रिलियन रुपए से अधिक (18% वार्षिक वृद्धि) |
| बिक्री मूल्य (60% हिस्सा) | 52,878 करोड़ रुपए |
| प्रति शेयर मूल्य | 81 रुपए |
| एक साल पहले प्रति शेयर मूल्य | 94.42 रुपए |
ये आँकड़े क्या बता रहे हैं? सब कुछ बता रहे हैं कि बैंक ठीक से चल रहा है। इसे बेचने की ज़रूरत नहीं थी। लेकिन बैंक के बेचने का संबंध केवल उसके घाटे या मुनाफ़े से नहीं होता, उसके खराब और अच्छे प्रदर्शन से भी नहीं होता।
IDBI का इतिहास — जनता के पैसे की कहानी
1964 में भारत के उद्योगों की मदद के लिए IDBI की स्थापना की गई। इसलिए इसका पूरा नाम Industrial Development Bank of India रखा गया। 1976 में इसका राष्ट्रीयकरण कर दिया गया और भारत सरकार इसकी मालिक हो गई। 2004 में यह बैंक कमर्शियल बैंक में बदल दिया गया, इसका उद्देश्य व्यापक किया गया।
लेकिन बैंक का NPA बढ़ता गया। कॉर्पोरेट के लोन नहीं चुकाने के कारण संकट गहराता गया। 2017 में RBI ने IDBI पर कुछ अंकुश लगाए और अपनी निगरानी में ले लिया। 2018 में सरकार ने 51 प्रतिशत हिस्सेदारी LIC को 21,624 करोड़ रुपए में बेच दी। लेकिन बैंक के प्रबंधन पर नियंत्रण सरकार का ही रहता रहा। मालिकाना हक LIC को नहीं मिला। तो फिर LIC ने 51 प्रतिशत हिस्सेदारी क्यों खरीदी? शायद उस वक़्त जनता के गुस्से से बचना था — ऐसा दिखाना था कि हमने सिर्फ़ हिस्सा बेचा है, मालिकाना हक नहीं बेचा।
2018 में ही जब यह कदम उठाया गया, तब फ्रंटलाइन में वी. श्रीधर ने लिखा था कि सार्वजनिक क्षेत्रों के निजीकरण की प्रक्रिया शुरू हो गई है। 2026 में वी. श्रीधर की बात सच हो गई। सच तो तब भी थी, बस लोगों का ध्यान नहीं गया होगा कि IDBI में LIC 51 प्रतिशत की हिस्सेदारी खरीद रही है और मालिकाना हक भी नहीं ले रही। LIC का मतलब है जनता का पैसा। भारत की जनता के पैसे से भारत का एक सरकारी बैंक घाटे से उबरने लगता है। जब 2020 से मुनाफ़ा कमाने लगा, छह साल में 30,000 करोड़ से अधिक का मुनाफ़ा हो चुका, तब उसे बेच दिया गया।
राइट-ऑफ़ और NPA की राजनीति
अख़बारों में आपने पढ़ा होगा कि पिछले 10 साल में मोदी सरकार ने लाखों करोड़ रुपए राइट-ऑफ़ किए हैं। यह NPA का पैसा है। NPA की अपनी राजनीति होती है। आप एक रुपया लोन चुकाने में दो मिनट की देरी कर देंगे, बैंक वाले आपके घर पहुँच जाएँगे। लेकिन हज़ारों करोड़ रुपए का लोन लेकर डुबा दीजिए, बड़े-बड़े कॉर्पोरेट वाले गोल्डन चैनलों पर मौज-मस्ती करते नज़र आएँगे। छोटे व्यापारियों को भी ऐसी सुविधा नहीं मिलती। लाखों करोड़ लोन डिफ़ॉल्ट करने वाले कुछ ही बड़े कॉर्पोरेट को इस पर क़राहत दी जाती है।
NPA के बावजूद IDBI ने अपना प्रदर्शन बेहतर किया। LIC को शेयर बेचकर और सरकार की मदद से घाटे कम होने लगे। बैंक का प्रबंधन पटरी पर आया। इसी साल मार्च में जब वित्त वर्ष 2026 समाप्त हुआ, तब IDBI ने 9,513 करोड़ का मुनाफ़ा कमाया। बैंक का कुल डिपॉज़िट 3.46 ट्रिलियन हो गया, एक साल में 12 प्रतिशत बढ़ा। बैंक का लोन भी बढ़ा। लोन देकर ही बैंक पैसे कमाते हैं।
ज़मीन, कर्मचारी और आरक्षण — बिक्री के अनदेखे पहलू
भारत सरकार में सचिव पद से रिटायर हुए एक अधिकारी ने अपने पत्र में कुछ उदाहरण दिए हैं। हैदराबाद में बहुत अच्छी जगह पर IDBI के पास पचास एकड़ से अधिक की ज़मीन है, जिसकी मौजूदा कीमत 269 करोड़ रुपए प्रति एकड़ बताई जा रही है। केवल इस पचास एकड़ ज़मीन की कीमत 13,450 करोड़ हो जाती है। इसी तरह IDBI के पास और भी शहरों में ज़मीनें होंगी। केवल ज़मीनों की वैल्यू जोड़ लें तो 50,000 करोड़ से अधिक की राशि हो जाती है।
IDBI में 19,000 से अधिक कर्मचारी काम करते हैं, और इनमें से 9,500 कर्मचारी अनुसूचित जाति, जनजाति और OBC वर्ग के हैं। IDBI के ख़त्म होते ही, यानी प्राइवेट होते ही आरक्षण भी ख़त्म हो जाएगा। CPIM के जॉन ब्रिटस ने इसी बात पर ज़ोर देते हुए जून में निर्मला सीतारमण को पत्र लिखा कि बात सिर्फ़ विनिवेशीकरण की नहीं है — 20,000 कर्मचारियों और उनके सोशल रिज़र्वेशन सुरक्षा की भी है। यह भारतीय बैंकिंग के विदेशीकरण का संकेत है।
भारत कब तक इस तरह से निजीकरण की राह पर चलता रहेगा जिसमें किसी कंपनी को खड़ा करने में भारत की जनता पैसे लगाएगी, कंपनी घाटे में आएगी तो बचाने के लिए भारत की जनता फिर से लगाएगी, और कंपनी मुनाफ़ा कमाने लगेगी, तो उसे प्राइवेट हाथों में बेच दिया जाएगा?
शेयर मूल्य का खेल और बिज़नेस अख़बारों का नृत्य
IDBI के शेयर का दाम भी कम लगाया गया। एक शेयर का दाम 81 रुपया लगाया गया, जो कि कम बताया जा रहा है। इसके बचाव में सरकार ने लंबे-चौड़े जवाब दिए हैं, जिसके अनुसार अधिक दाम पर कोई खरीदार ही नहीं आ रहा था। लेकिन एक साल पहले सरकार ने इसी बैंक का एक शेयर 94 रुपया 42 पैसे रखा था। खरीदार नहीं आ रहे थे, वैसे ही जैसे टेंडर में कोई कंपनी नहीं आती है और हमेशा वही कंपनी आ जाती है। या जब उस कंपनी को आना होता है तो बाकी कंपनियाँ आ ही नहीं पातीं। जिस बैंक की बैलेंस शीट एकदम क्लीन हो, उसके शेयर के दाम में 6.5% से ज़्यादा कटौती कर दी गई।
बिज़नेस अख़बारों का निवेश-डांस चल रहा है। खबरों में बताया जा रहा है कि नीति आयोग ने Central Bank of India और Indian Overseas Bank का चयन किया है। तो IDBI के बाद और भी बैंकों को बेचा जा सकता है। एक बैंक विदेशी को और एक बैंक देशी को — हिसाब हो गया बराबर।
कर्मचारियों की चुप्पी और व्हाट्सएप ग्रुप की संस्कृति
IDBI या सभी बैंकों के कर्मचारियों से कुछ सवाल हैं। हो सकता है उन्हें इस बात से खुशी हो कि कोई तो है जो एक सफल बैंक को बेचे जाने पर वीडियो बना रहा है। उन्हें यह भी उम्मीद होगी कि इससे पब्लिक ओपिनियन बनेगा। लेकिन बैंक के अधिकारी आर्थिक मामलों को बेहतर समझते हैं। सवाल यह है कि उनके व्हाट्सएप ग्रुप में 2014 के बाद से अर्थव्यवस्था को लेकर किस तरह की बातें होती रही हैं? या डर से उन्होंने सच्ची बात बंद कर दी और उसकी जगह मंदिर-मस्जिद, मुसलमान विरोधी राजनीति के मीम ठेले जाने लगे? राहुल गांधी को पप्पू बताकर मज़ा लिया जाने लगा?
अगर बैंक के ही कर्मचारी अर्थव्यवस्था की सच्चाई को लेकर आपस में व्हाट्सएप ग्रुप में बात नहीं कर रहे हैं, एयरपोर्ट के बेचे जाने को लेकर एक-दूसरे से नहीं कह रहे हैं कि जनता का पैसा लगाकर दो-चार उद्योगपतियों को बेचा जा रहा है, तो फिर उन सभी कर्मचारियों को पब्लिक से क्यों उम्मीद है कि वह बैंक के बेचने पर विचार करेगी और अपना दबाव सरकार पर डालेगी? जब बैंक वाले खुद नहीं कर रहे, तो पब्लिक बैंक की क्यों चिंता करेगी?
बैंक के सभी कर्मचारियों को अपने-अपने व्हाट्सएप ग्रुप में जाकर पुराने मैसेज देखने चाहिए कि बैंकिंग सेक्टर के प्रबुद्ध लोग 2014 के बाद से किस तरह की बातें कर रहे थे। SIT के ज़रिए वोट काटे जा रहे हैं, लोगों के वोट के अधिकार छीन लिए गए — क्या इस पर उनके व्हाट्सएप ग्रुप में कुछ आर्टिकल शेयर किए गए हैं? बैंक तो चला गया, अब आत्ममंथन करने का ही रास्ता बचा है।
लोकतंत्र और विरोध का दमन
यह सवाल बहुत ज़रूरी है — जिस देश में Gen Z को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने नहीं दिया जाता, आशुतोष रांका, सौरव दास और नेहा बोरा को जंतर-मंतर नहीं जाने दिया गया, नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को जंतर-मंतर नहीं जाने दिया गया, 300 सांसदों को नहीं जाने दिया गया, उस देश में बैंक के मैनेजर, अधिकारी, कर्मचारी अगर लाउडस्पीकर लेकर मोहल्ले में निकलेंगे, लोगों को जागरूक करने, तो क्या उन्हें करने दिया जाएगा? अगर नहीं, तो उन्हें लौटकर अपने ब्रांच में इस पर विचार करना चाहिए कि इस देश को यहाँ तक लाने में उनका कितना योगदान रहा है।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ट्विटर पर लिखा है कि बस अब सरकार बेचनी बाकी है। लगता है भाजपा सरकार ने अपनी दुकान बंद होते देख सीज़न एंड सेल लगा कर सब बेचकर निकलने का प्रोग्राम बना लिया है। All India Bank Employee Association ने लिखा कि वे IDBI बैंक के निजीकरण और विदेशीकरण के खिलाफ़ हैं और इसे वापस लेने की मांग करते हैं। लेकिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जवाब दिया कि UPA ने बैंकों की हालत खराब की। सवाल यह है कि जब मोदी सरकार ने बैंकों को संकट से उबारा, तब बेचने की स्थिति क्यों आ रही है? क्या निर्मला सीतारमण ने यह कहा कि 2004 में BJP की सरकार ने आश्वासन दिया था कि IDBI में सरकार की हिस्सेदारी 51 प्रतिशत से कम नहीं होगी?
क्या किया जाना चाहिए
एक बैंक का निजीकरण क्यों ग़लत है? सरकारी बैंक के कर्मचारियों को हर जगह जनता को बताने के लिए वर्कशॉप लगाना चाहिए। जहाँ-जहाँ उनके ब्रांच हैं, हड़ताल के दिन कार्यशालाओं का आयोजन करना चाहिए, पैम्फ़लेट बाँटना चाहिए, जनता को जागरूक करना चाहिए। लेकिन पहले उन्हें देख लेना होगा कि क्या ऐसा करने दिया जाएगा।
12 करोड़ निवेशकों का पैसा पिछले तीन-चार साल से घाटे में जा रहा है। कई सौ कंपनियों के रिटर्न नेगेटिव में हैं। SIP घाटे में है। जनता को समझ ही नहीं आ रहा कि उसके साथ हो क्या रहा है, उसका पैसा जा कहाँ रहा है। बैंक और एयरपोर्ट को निजी हाथों में बेचने, या किसी कॉलेज या यूनिवर्सिटी को निजी हाथों में बेच देने का खेल इतनी आसानी से समझ नहीं आता।
इसलिए कर्मचारियों को चाहिए कि वे अपने व्हाट्सएप ग्रुप में जाकर पुराने मैसेज देखें। जब जनजी को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने से रोका जा रहा था, तब वे अपनी फैमिली और ऑफ़िस के व्हाट्सएप ग्रुप में क्या लिख रहे थे? समर्थन कर रहे थे या आलोचना? यह बात पहले देख लेनी चाहिए, और तब बैंक के मैनेजर, कर्मचारी लाउडस्पीकर लेकर मोहल्ले में निकलें, लोगों को जागरूक करें।
आलोचनाएँ
मोदी सरकार द्वारा मुनाफ़े में चल रहे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक IDBI को विदेशी कंपनी के हाथों बेचा गया।
सरकार के आधिकारिक प्रचार माध्यमों द्वारा बैंक के घाटे का पुराना आँकड़ा पेश कर जनता को गुमराह किया गया, जबकि 2020 के बाद का लगातार मुनाफ़ा छिपाया गया।
LIC के रूप में जनता के धन से घाटे में चल रहे बैंक को उबारा गया, और उसके लाभ में आते ही उसे निजी हाथों में सौंप दिया गया।
भाजपा के पूर्व वित्त मंत्री द्वारा संसद में दिए गए आश्वासन को भाजपा सरकार द्वारा ही तोड़ा गया।
सरकार द्वारा बैंक के शेयर का मूल्य एक वर्ष पहले के 94.42 रुपए से घटाकर 81 रुपए कर दिया गया, जिससे सार्वजनिक संपत्ति की सस्ती बिक्री हुई।
सरकार द्वारा बैंकों में विदेशी निवेश की सीमा 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 49 प्रतिशत करने पर विचार किया जा रहा है, जिससे भारतीय बैंकिंग सेक्टर का विदेशीकरण होगा।
केंद्र सरकार द्वारा 9,500 से अधिक SC, ST और OBC कर्मचारियों के आरक्षण की सुरक्षा को बिक्री के बाद समाप्त किए जाने का मार्ग प्रशस्त किया गया।
सरकार द्वारा लोकतांत्रिक विरोध को दबाया गया — जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने से आम नागरिकों, पत्रकारों और विपक्षी नेताओं को रोका गया।
बिज़नेस अख़बारों द्वारा सरकारी संपत्तियों की हर बिक्री को बिना आलोचनात्मक विश्लेषण के सफल क़दम बताया गया, जबकि जनता के पैसे पर उद्योगपतियों के नियंत्रण की प्रक्रिया को सामान्य बना दिया गया।
बैंक कर्मचारियों द्वारा अपने व्हाट्सएप समूहों में आर्थिक मुद्दों की बजाय सांप्रदायिक और विभाजनकारी विषयों को बढ़ावा दिया गया, जिससे सार्वजनिक संपत्तियों की बिक्री के ख़िलाफ़ एकजुट आवाज़ नहीं उठ सकी।
सरकार द्वारा NPA के नाम पर हज़ारों करोड़ रुपए के लोन डिफ़ॉल्ट करने वाले बड़े कॉर्पोरेट घरानों को संरक्षण दिया गया, जबकि आम कर्ज़दारों को कठोर वसूली प्रक्रिया से गुज़रना पड़ा।
मोदी सरकार द्वारा सार्वजनिक उपक्रमों — बैंक, एयरपोर्ट, संस्थान — को व्यवस्थित रूप से बेचने का पैटर्न अपनाया गया है, जिसमें जनता पैसे लगाती है और मुनाफ़ा निजी हाथ ले जाते हैं।
सरकार द्वारा यह दावा किया गया कि बैंक को बचाने के लिए जनता का पैसा लगाना ज़रूरी था, लेकिन जब बैंक मुनाफ़े में आया तो उसी जनता से उसके लाभ का हक़ छीनकर विदेशी निवेशकों को दे दिया गया।
यह कहानी सिर्फ़ IDBI की नहीं है। यह इस सवाल की कहानी है कि इस देश की जनता की कमाई से बनी संपत्तियाँ आख़िर किसके लिए हैं — जनता के लिए या उनके नाम पर मुनाफ़ा कमाने वालों के लिए।
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